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वीर मणिभद्र देव

वीर मणिभद्र देव की साधना से होती है धन की प्राप्ति

मणिभद्र वीर देव की साधना से परिणाम बहुत जल्दी मिलते हैं और जो साधक इनकी सच्ची साधना करते हैं उन्हें शीघ्र ही धन प्राप्ति होती है। इसका कारण है कि यक्ष लोक के यक्ष यक्षिणी अदृश्य रूप में उन साधकों को सहयोग करते हैं जो मणिभद्र देव की साधना करते हैं क्योंकि मणिभद्र वीर देव को यक्ष सेना का सेनापति कहा जाता है व यक्ष लोक में इनका एक विशिष्ट स्थान है।

उज्जैन शहर के भैरूगढ़ में विक्रमादित्य की 15वीं शताब्दी में वि.स. 1541 बसंत पंचमी के शुभ दिन श्रेष्ठीवर्य सुश्रावक धर्मप्रिय एवम सुश्राविका जिनप्रिया की इसी जगह स्थित हवेली में एक पुत्र रत्न का जन्म हुआ जिसका नाम माणक चन्द्र रखा गया। इसी घर में पद्मावती माता का घर देरासर भी था। शेरावकाल पूर्ण करके जब योवन अवस्था में उन्होंने कदम रखा धारानगरी के भीमसेठ की पुत्री आनंदरति के साथ उन्हें विवाह के बंधनाकें में बांध दिया।

एक बार उज्जैन मंे लोकशाह पंथ के साधुओं का आगमन हुआ माणकचंद्र उनके संपर्क में आकर मूर्ति पूजा से विमुख हो गया इस घटना से माँ को बहुत दुःख हुआ। जब उनकी माँ को ओलीजी का पारणा था तब माँ ने यह प्रतिज्ञा ली कि जब तक माणक सन्मार्ग पर नहीं आएगा तब तक घी का त्याग करा। इस प्रकार छः माह व्यतित हुए। इधर उज्जैन नगरी के बाहर बगीचे में आचार्य श्री हेमविमलसुरिजी पधारे माता के आग्रह से माणक आचार्य श्री के पास गया और देखा कि आचार्य श्री कायोत्सर्ग ध्वज में लीन है उनकी परीक्षा हेतु माणक ने जलती हुई लकड़ी से उनकी दाड़ी जला दी फिर भी आचाय्र श्री ने क्षमा करा। माणक को अपनी भुल का एहसास हुआ और किए हुए पाप की क्षमा याचना की।

आचार्यश्री ने माणक की मूर्ति पूजा संबंधी समस्त शंकाओं का निवारण किया और मासुदी पंचमी के शुभदिन उन्होंने सद्धर्म को अपनाया एवं बारह व्रतों को धारण किया। वहां से विहार कर के आचार्य श्री आगरा पधारे। संयोग से माणकचंद भी अपने व्यापार हेतु आगरा आ गए वहां गुरूदेव के मुख से शत्रुंजय तीर्थ की महिमा सुनकर उन्होंने संकल्प किया जब तक शत्रुंजय तीर्थ की यात्रा नहीं करूंगा तब तक अन्न जल ग्रहण नहीं करूँगा। वहां से यात्रा हेतु प्रस्थान किया। चलते-चलते मगरवाडा के घनघोर जंगल में पहुँचे वहां पर डाकुओं ने उनको व्यापारी समझकर घेर लिया और तलवार से प्रहार किया जिससे इनके शरीर के तीन हिस्से हुए प्रथम हिस्सा धड़ गिरा आगलोड में, दूसरा हिस्सा पिंडी गिरी मगरवाडा में एवं मस्तक उछलकर जन्म स्थली उज्जैन (भैरूगढ़) में गिरा। सेठ अंतिम समय में शत्रुंजय के शुभ ध्यान से मरकर व्यंतर निकाय में मणिभद्र देव बने जो एकावतरी तथा सम्यक दृष्टि देव है जो एरावत हाथी पर विराजमान है।

कुछ समय के बाद इधर अचानक आचार्य श्री हेमविमलसुरिजी के साधुओं पर किसी ने मेली विद्या का प्रयोग किया जिससे चित भ्रमित हो कर साधुओं का कालधर्म होने लगा। आचार्यश्री ने जब ध्यान लगाया तो अधिष्ठायक देव ने दिव्य संकेत दिया कि आप गुजरात में मगरवाडा गाँव में जाकर अष्ठम ताप पूर्वक साधना करोगे तो यह उपद्रव मिट जाएगा। गुरूेदव वहां पहुँचे उनके ध्यान व तप के प्रभाव से मणिभद्रजी साक्षात प्रकट हुए और अपना परिचय दिया कि मैं वहीं माणकचंद सेठ हूँ, शुभ ध्यान पूर्वक मृत्यु पाकर मैं मणिभद्र देव के रूप में उत्पन्न हुआ हूँ। फिर गुरूदेव के मुख से उपद्रव की बात सुनकर उपद्रवकारी काला गौरा भैरव के साथ युद्ध करकेे उन्हें परास्त किया व भविष्य में मुनि हत्या न करने की उन्हें प्रतिज्ञा दी। फिर गुरूदेव से विनती करी कि मेरी जागृति के लिए आप तपागच्छ के उपाश्रय में मेरी स्थापना करवाइए ताकि आने वाले साधू साध्वी मुझे धर्म लाभ देते रहे और जो भी मुझे सच्चे मन से याद करेगा मैं उसकी हर मनोकामना पूर्ण करूँगा और जिन शासन की हमेशा रक्षा और सहायता करूँगा इस तरह श्री मणिभद्र यक्षराज की महासुदी पंचमी के दिन स्थापना हुई और तपागच्छ के रक्षक देव प्रसिद्ध हुए।

जहां मस्तक गिरा था वह यही पावन स्थान है उज्जैन भैरूगढ़ में सेठ माणकचंद्र की हवेली है जो उनकी जन्म स्थली है यहां जैनाचार्य श्री हेमविमलसुरिजी के कर कमलों से श्री मणिभद्र जी की प्रतिष्ठा हुई थी। समया के प्रवाह से यह हवेली करीब 600 सालों से काल के थपेड़े खा खाकर जीर्ण शीर्ण हुई। वि.स. 2039 में चारूप तीर्थ में मणिभद्र देव द्वारा दिए प्रत्यक्ष दर्शन के बाद प.पू..पन्यास प्रवर गुरूदेव श्री अभयसागरजी म.सा. के लिखित आदेश से उनके पट्टधर शिष्य प.पू. आचार्य श्री अशोकसागर सूरिश्वरजी म.सा. ने इस जन्मभूमि हवेली का जीर्णाेद्धार तथा नूतन केशरियानाथ दादा के जिनालय का निर्माण करा कर वि.स. 2066 महासुदी ग्यारस दिनांक 11 फरवरी 2010 को इस तीर्थ की प्रतिष्ठा संपन्न कराई। आज इस तीर्थ में यात्रियों के ठहरने एवं भोजन की उत्तम व्यवस्था है।